Friday, 26 December 2014

पूर्वांचल राज्य मोर्चा



II पूर्वांचल राज्य क्यों बनना जरुरी है II 


पूर्वांचली लोग उत्तरप्रदेश में शुरू से ही उपेक्षित रहा हैं I अब तो हमलोगों की पहचान भी समाप्ति के कागार पर पहुँच चुकी है - कहीं हमें बिहारी कहा जाता है तो कहीं हमें भैया I कुछ लोगों की सोच ऐसी है की वे हम सब को उनका बोझ ढोने वाला मजदुर या कुली ही समझता है I ऐसा क्यों है की यदि हम आपस में भोजपुरी में बात करते हैं तो लोग संदेह की नज़रों से घूरते हैं I भोजपुरी भाषाई परिवार के स्तर पर एक आर्य भाषा है  ,हमारी बहुत उन्नत सभ्यता और संस्कृति रही है I  भारत के जनगणना आँकडो़ के अनुसार भारत में लगभग 3.3 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं। पूरे विश्व में भोजपुरी जानने वालों की संख्या लगभग 5 करोड़ है। फिर भी भोजपुरी भाषा आजतक उपेक्षित है I  यही नहीं भोजपुरी के उपेक्षा के कारण लोकसंगीत और लोकगायक धीरे धीरे समाप्ति के कागार तक पहुँच चुके हैं I  
हमारे पूर्वांचल में पॉलिटिक्स रग रग में खून बनकर दौड़ता है I यहाँ से कई बड़े बड़े नेता निकले हैं ...फिर भी इस क्षेत्र के विकाश के लिए कुछ खास नहीं कर पाए I क्या कारण है की ,जिस पूर्वांचल के लोगों ने नेताओं को विधान सभा ,लोकसभा और राज्य सभा भेजा ,उन आम लोगों की आज दुर्गति हो रही है I लोग भुखमरी के कागार तक पहुँच चुके है I आज तक किसी नेता ने ऐसी कोई पहल नहीं की ,यहाँ इंडस्ट्री या उद्द्योग धंदे लगवाने की, न ही अपना ध्यान दिया यहाँ की समस्यायों पर I यहाँ बेरोजगारी दिन दुने रात चौगुने के हिसाब से बढ़ रही है I यहाँ के नवयुवकों के पास न ही रोजगार है और न ही धन है ,की कोई स्वरोजगार शुरू कर सकें I कहते हैं न खली दिमाग शैतान का घर होता है ,तो दिख भी रहा है ...आजकल छिनताई ,चोरी,लुट मार बेतहासा बढ़ चुकी है इस क्षेत्र में I जो लोग हिम्मत करके बहार रोजगार के सिलसिले में जाते भी हैं उनका हालत यह है की आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपईया I बेचारे करे भी तो क्या करे...जहाँ काम धन्दा कर रहे हैं वहां रहने खाने का खर्च तो है ही और घर पर माँ बाप को भी देखना पड़ता है ...घर का भी पूरा खर्च उठाने के बाद खुछ बचता ही नहीं है I करें तो क्या करें ???
किसानो की हालत किसी से छुपी नहीं है I किसानी करना सबके बस की बात भी नहीं रही I न लाभ मिलता है और न ही अच्छी खेती ही हो पाती है I बारिश न हो तो सुखा ,बारिश हो तो बाढ़ ...क्या करे हमारे अन्नदाता I बाढ़ आती है गांव के गांव बहा ले जाती है ...सरकार के कुछ नेता दौरा पर दौरा करके चले जाते हैं ...कुछ दया आ गयी तो कुछ अनुदान राशी भी बाँट दी जाती है ....नहीं तो सिर्फ तमासा बनकर रह जाते है किसान ...ऐसा क्यों है ??
हस्तकला की पूछिये ही मत ....यही के लोगों ने इसे भुला दिया है ? क्यों भुला दिया भाई ...क्योंकि हाथ से बनी वस्तु अब बाजार में नहीं बिकती...क्योंकि इसका कोई प्रचार प्रसार भी नहीं किया गया सरकार की तरफ से I इसलिए लोग धीरे धीरे अपने पुस्तैनी कामों को छोड़ छाड़ कर  दुसरे शहरों में हमाली कर रहे हैं I सरकार चाहती तो क्या नहीं कर सकती थीI सरकार की इस उपेक्षा का कारण क्या है ?

हम बाहर के शहरों में राज्यों में जाते हैं ,वहां हमारी मेहनत से छोटे मोटे उद्द्योग धंधे फलते फूलते -बड़े बड़े उद्द्योग धंधे बन जाते हैं...शहरों की चमक बढ़ जाती है ...राज्यों का विकाश दर बढ़ जाता है I तो क्या हम अपने शहरों और गांवों में वो चमक नहीं ला सकते हैं ? बिलकुल ला सकते हैं , जो काम हम बाहर के शहरों में करते हैं वो काम हमें अपने शहर और गांव के पास मिले तो हमारा शहर और गांव भी चमक उठेंगे I लेकिन राजनैतिक उदाशीनता की वजह से हमारा पूर्वांचल विकाश नहीं कर पा रहा है I उद्द्योग पति यहाँ नहीं आना चाहते ! क्योंकि उन्हें यहाँ के कानून व्यवस्था पर भरोसा नहीं है I यहाँ बिजली के खम्बे तो दिख जायेंगे पर उस पर टंगे तारो में कभी कभार ही करंट दौड़ती है I सड़कें ऐसी है की ट्रक की टंगड़ी भी टूट जाए ,सायकिल की क्या मजाल I कानून व्यवस्था ऐसी है की पुलिश और दरोगा को भी अपनी सुरक्षा की जरुरत महसूस होने लगी है क्योंकि वे भी अपने को शेफ महसूस नहीं कर रहे हैं ! अब सोचिये जहाँ पुलिश वाले ही सुरक्षित नहीं हैं ...वह हमारी और आपकी क्या औकात I
जब साहब कानून व्यवस्था सही नहीं है और रोजगार के लिए मारा मारी हो तो खेल कूद या स्पोर्ट्स की छोड़ ही दीजिये I यदि युवकों का सारा ध्यान बाहर के सहारों और देशों में जाकर रोजगार करने में लगा रहेगा तो क्या खाक हमें नेशनल और इंटरनेशनल प्लेयर मिलेगा I हमारे बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है फिर भी उनके सामने समस्या यह है की भूखे पेट खेल कूद नहीं होता साहब I
रही बात एजुकेशन की ..वो तो जगजाहिर है सरकार की नीतियाँ I सस्कूलों में आजकल सिर्फ खाना खिलाया जाता है ..बच्चे भी खिचड़ी के चक्कर में स्कूल हो आते हैं I अब कितना और तारीफ करें आपलोग समझदार हैं समझ सकते हैं I जो पैसे वाले हैं उनके बच्चे बड़े बड़े स्कूलों में पढ़ लिख आते हैं ....गरीबों के बच्चों को कौन पूछता है ? आज सरकारी स्कूलों से पढ़े बच्चे अंग्रेजी का फॉर्म तक नहीं भर पातें ....क्या हम उन्हें सिर्फ साक्षर बना रहे हैं ..सिर्फ सिक्षा में साक्षरता दर दिखने के लिए ? सोचियेगा जरुर !!
क्या उपरोक्त सभी समस्यायों का कारण सिर्फ इतना है की हम पूर्वांचली है ????
एक बार फिर से सोचिये जरा ....क्या हमारी मांग अनुचित है ...क्या हमें विकाश, उन्नति, रोजगार, अच्छी  क़ानून व्यवस्था नहीं चाहिए I क्या हमें 24 घंटे बिजली नहीं मिलनी चाहिए I हमारी पहचान को क्या हम ऐसे ही समाप्त होने देंगे I हमारी मुख्य मांग है की हर पूर्वांचली को रोजगार मिले  ,उन्हें भी अच्छी सिक्षा दीक्षा मिले, कम से कम सारे स्कूलों को सीबीएसई पैटर्न के हिसाब से स्टैण्डर्ड तय किया जाय I किसानो की हालत में सुधार हो ,अच्छी क़ानून व्यवस्था लागु हो ...सभी लोग सुख शांति से रहें ..किसी को भी घर द्वार छोड़कर बहार जाकर नौकरी चाकरी करने की जरुरत न पड़े II.......................
जय पूर्वांचल , जय हिन्द
 धन्यवाद
आशुतोष सिंह कौशिक
(राष्टीय उपाध्यक्ष)
पूर्वांचल राज्य मोर्चा 




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